मुहब्बत में जब रब की इनायत हो जाती है
जो भी वो बोलें वही रुबायत हो जाती है
तरसे हो इक कतरा और मिल जाए दरिया
तक़दीर में कभी ऐसी कवायत हो जाती है
आतिश-ए-इश्क़ सुलग जाए तो बुझता नहीं
रब से मेरी बरहा शिकायत हो जाती है
उन्हें सोच कर मैं न सोचूँ किसी और को
उनकी मुझे ऐसी भी हिदायत हो जाती है
फ़िज़ाओं में जब तेरी सदा गूंज उठती है
ख़ामोश दिलों में भी रवायत हो जाती है
लबों पे दुआ निकले तो असर होता है
बंदी दुआ से भी रिहायत हो जाती है
तुम न हो तो तुम्हारे अक्स से ही प्यार करूँ
‘राजा’ से भी ऐसी हिमायत हो जाती है
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