मेरी हसरतो को और कितना तरसाओगे
कभी तो तुम मेरी उल्फ़त को समझ पाओगे
कश्ती मेरी मझधार में ले जा रहे हो
डूब गया मैं तो तुम भी कहाँ बच पाओगे
मैं कतरा ही सही मेरा कुछ वजूद तो है
मैं न रहूँ तो तुम समंदर कहाँ से पाओगे
मैं वक़्त हूँ, थाम लो मुझे बाँहों में
गुज़र गया ये पल तो बस पछताओगे
आवाज़ दोगे जब भी मुझे दिल के झरोकों से
हर तरफ दिखूँगा जिधर नज़र घुमाओगे
अभी तो रात बाक़ी है फिरो तुम आवारा
सुबह तो तुम लौट के घर ही आओगे
जलेगा उम्मीद-ए-चराग़ मेरे बुझने तक
हर लौ में दिखूँगा, जो शमा जलाओगे
भूले से भी कोशिश करोगे ‘राजा’ को भूलने कि
उतना ही याद आऊँगा जितना मुझसे दूर जाओगे
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