हर चमन में

हर चमन में

हर चमन में इश्क़-ए-गुल कहाँ खिलता है

जहाँ उम्मीद हो इसकी कहाँ मिलता है

 

क्यों डरें हम इश्क़ के अजब इम्तिहानों से

बिना तपे आग में सोना कहाँ खिलता है

 

जिसने न माना इश्क़ को अपना ख़ुदा यारों

वो ज़िन्दगी भर यहाँ खाली हाथ मलता है

 

इश्क़ रहमत है, मिलती है रब के करम से

रब तो सिर्फ़ इश्क़ वालों को ही मिलता है

 

ठुकराया जिसने भी इश्क़ अपने यार का

वो गीली लकड़ी-सा यहाँ धुआँ-धुआँ बलता है

 

इश्क़ मुकम्मल है गर आग दोनों तरफ़ लगी हो

शमा के साथ-साथ परवाना भी जलता है

 

इश्क़ फ़कीरी है और इश्क़ ही बादशाही

इश्क़ के आगे कोई रुतबा नहीं चलता है

 

इश्क़ वालों पे चढ़ी रहती है हर पल ख़ुमारी

उनका हर लम्हा बेख़ुदी में निकलता है

 

होंगे बेशुमार तुम्हारे रहनुमा मगर

इश्क़ ‘राजा’ का रब के साये में पलता है

G021

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