हर आदमी अकेला परेशान बहुत है
इस शहर में दोस्त कम अंजान बहुत हैं
आदमी को हासिल नहीं इक कतरा सुकूं
उसके पास आराम का सामान बहुत है
महफिलों में नाचता-फिरता ये आदमी
उसके अंदर गहरा सुनसान बहुत है
नहीं पहचाना ख़ुद को जब आईना देखा
मगर उसकी लोगो में पहचान बहुत है
अपनी ही नजरों में गिरता ये आदमी
मगर उसकी ऊंची उड़ान बहुत है
गुमशुदा ये आदमी अपनी तलाश में
अपनी ही पहचान से अनजान बहुत है
आदमी क़ो कामिल नहीं इक टुकड़ा जहाँ
यूं तो कहने को आसमान बहुत है
G002
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