यें जो जिंदगी की किताब है
ये किताब वाकई लाजवाब है
कभी खुशनुमा ख्याल है
कभी जानलेवा अज़ाब है
कभी सहरा है ये ज़िन्दगी
कभी शबाब ही शबाब है
जहाँ न हो इक कतरा उम्मीद
वहाँ मिल जाते सैलाब है
कभी दरमियां है फासले
कभी मोहब्बत बेहिसाब है
कभी शर्मों-हया न दूर तक
कभी चेहरे पे हिज़ाब है
कभी हाथों-पैरों में बेड़िया
कभी हुकमन ये नवाब है
कभी बेसुरी इसकी ज़ुबां
कभी हाथों में इसके रबाब है
जब भी जीने कि वजह पूछी
कभी मिलते नहीं जवाब है
कभी दो गज़ जमी ना नसीब
कभी सारे जहाँ के नवाब है
जिसने भी इसको पढ़ लिया
उसे दिल से मेरा आदाब है
अज़ाब – दुःख, पीड़ा
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