ना कोई आँख नम हो ना वफा ही कम हो
कभी किसी से दूर उसका सनम हो
ऐसी इक दुनिया बना दे मेरे मोला
जहाँ कभी किसी को ना कोई भी गम हो
हर शख़्स में तेरी ही सूरत नज़र आए
हम सब पे तेरा ही रहमो-करम हो
दिलों में हमारे न पनपे मज़हबि सरहदे
हर दिल में सिर्फ इंसानियत का जन्म हो
कभी तो सब मज़हब एक सूरत में ढलें
कहीं किसी को ना कोई वहम हो
मज़हबी जहालत को मिटा दे जहाँ से
रहे भरोसा ही बस ना कोइ भरम हो
‘राजा’ का मज़हब अगर हो तो बस यही
हर दिल का मज़हब इंसानियत धर्म हो
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