Posted inKavita मर्द Posted by Bhuppi Raja January 12, 2005No Comments मर्द क्या तुमने कभी देखा हैकिसी मर्द का चेहराआँसुओं में डूबा हुआ नहीं देखा ना!अरे वो मर्द ही क्याजिसका चेहराआँसुओं में डूब जाएया जिसकी आँख सेएक भी आँसू निकले हम तो दूसरों का चेहराआँसुओं में डुबोने वालों कोमर्द कहते हैं,चाहे वो पत्नी कोघर से निकाल देने वालासतयुग का राम होया उसका व्यापार करने वालाकलयुग का आदमी मगर ठीक विपरीतमैं अपना चेहराआँसुओं में डुबोता हूँकभी अपने लिएकभी औरों के लिए मगर जब-जब मेरा चेहराआँसुओं में डूबता हैतब-तब मेरे चेहरे सेएक पुराना, सड़ा-गलागर्द भरा चेहरा झड़ता हैऔर मुझेएक नये सूर्योदय काआभास होता है अब आप मुझे मर्द मानोया ना मानोमुझे कोई फर्क नहीं पड़तामैं सूर्योदय देखता हूँदेखता रहूँगाअपना चेहरा आँसुओं में डुबोता हूँडुबोता रहूँगाकभी अपने लिएकभी औरों के लिए क्यूँकि मैं जानता हूँकि मैं सतयुग का राम तो हूँ नहींऔर कलयुग का आदमीबन नहीं पा रहा हूँ…K002 ग़ज़ल/ नज़्म दोहे कोट्स 0 Post navigation Previous Post ज़िन्दगीNext Postनेकी