ओह मेरी माँ,
तू चली गई है कहाँ,
छोड़ गई क्यों अकेला,
इस जलते जहाँ।
तेरी याद बहुत आती है,
दिल चीर जाती है,
और ये आँखें मेरी,
बरस-बरस जाती हैं।
तुझे ढूँढूँ मैं कहाँ,
तड़पता हूँ अकेला,
मैं यहाँ – वहाँ।
तू आजा यहाँ,
या बुला ले मुझे वहाँ,
उस अपने जहाँ,
नहीं लगता दिल मेरा
अब तेरे बिना।
याद आती है मुझे तेरी,
हर वो बात,
हाथों से बना तेरा,
रोज जब तू खाना बनाती
तो हम सब भाई बहन
सर्दियो में
अंगीठी के चारो तरफ
बोरी पर बैठकर
खाना बनने का
इंतजार करते
और तू गुरबानी का पाठ
करते करते खाना बनाती
और हमें भी
अपने साथ पाठ
करने को कहती
इस तरह हमें कई पाठ
आज भी याद हैं
खाना तो बहाना था,
जब हम तुझे कहते माँ
की आज मेने छे रोटियां खा लि.
तब प्यार से तू हमें
मुस्कुरस्ते हुए
हल्की डांट के साथ
कहती थी
की खाते समय रोटियां नहीं गिनते
बस पेट भरके खाते है
तेरे हाथो में इक
जादू था माँ
कभी ना खत्म होने वाली
रब की इक बरकत थी माँ
तेरे प्यार में ही डूबकर हम
तब कुछ समझ नहीं पाते थे
हम तो बस खाते ही जाते थे
अब समझा हूँ मैं माँ
उस गुरबानी की मिठास को
जो तेरे हाथों में आ जाती थी
और रोटी सब्जी के रास्ते,
हमारी थाली से होते हुए,
हमारे पेट में आ जाती थी
कभी महसूस नहीं होने दी
तूने हमें हमारी
गरीबी की दास्तान।
हर बार बिना पूछे
तू देती ही जाती।
हमारी थाली में
गर्म गर्म रोटीया
आती ही जाती थी
कभी ना चल पता हमें
की कब आटा खत्म हो गया
और कब सब्जी खत्म
तेरे साथ साथ हम भी तवे पर
अपनी छोटी छोटी गोगिया सकते और बडे स्वाद से खाते
आज समझ आया हैं की माँ
तेरे हाथों में इतनी
बरकत कयो थी।
जब हम देखते की
खाली कढ़ाही में
तू बस कड़छी चलाती,
और तेरे हिस्से की
थोड़ी बची-खुची रोटी सब्ज़ी भी
हमारी थाली में आ जाती।
मुझे लगता था तब पता,
देखता था तुझे जब
नमक से ही तू
बची रोटियाँ चबाती।
जब कभी भी मैं
दौड़ते-दौड़ते
गिर जाता,
दौड़कर तू आती
और मेरी चोटों पर
फूँक मारकर
मरहम लगाती।
मुझे रोते देख
तू घबरा जाती,
और अपनी
घबराहट छुपाकर
मुझे हौसला दिलाती।
बार-बार कहती,
“कुछ नहीं हुआ,
कुछ नहीं हुआ।”
और मेरा ध्यान
बँटाने के लिए
ज़मीन पर चलती,
चींटियाँ दिखाती।
और कहती जाती
कि देख चींटी का आटा गिर गया,
चींटी का आटा गिर गया है…
जब तक मैं
अपना दर्द भूल
चुप हो जाता,
और फिर
चींटियाँ देखने लगता
और माँ की और देख
मुस्कुराने लगता
आज भी तेरी
याद बहुत आती हैं माँ
आज फिर मैं
सदियों का भूखा हूँ
तेरे हाथ की
बरकत वाली
रोटी खाने को
दिल कर रहा है,
ओह मैरी माँ
तू आजा हैं जहाँ,
मुझे अपने हाथ से
रोटी खिला दे ना माँ।
आज फिर मैं गिर गया हूँ
और रो रहा हूँ मैं माँ
मुझसे अब उठा नहीं जाता
मुझे उठा दें ना माँ
तू अब क्यों नहीँ आती
मूझे क्यों नहीं उठाती
तू क्यूँ अब मेरा
हौसला नहीँ बढ़ाती
और चींटी का आटा मुझे
क्यों मूझे नहीं दिखाती
कैसे मुस्कुराऊ अब मैं माँ
रो रहा हूँ यहाँ
तू छुपी हैं कहाँ
मुझे आज फिर तेरी
ज़रूरत है।
यूँ जीना अब मुश्किल है,
बहुत मुश्किल है।
तू आजा ना माँ…
ओह माँ,
ओह माँ,
मेरी माँ,
मेरी माँ,
तू चली गई है कहाँ…
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